Commentary
।।16.2।। अहिंसा प्राणियों को पीड़ा न पहुँचाना अहिंसा है। स्वार्थ या द्वेषवशात् किसी को पीड़ित करना हिंसा है। अहिंसा का पालन शरीर? वाणी और मन इन तीनों स्तर पर होना चाहिए। कभीकभी बाह्यदृष्टि से कोई व्यक्ति शरीर को पीड़ा पहुँचाते हुए दिखाई देता है? जैसे एक शल्य चिकित्सक रोगी की चिकित्सा करते हुऐ? उसे पीड़ा देता है किन्तु वह हिंसा नहीं मानी जाती। वैसे भी शारीरिक स्तर पर सम्पूर्ण अहिंसा संभव नहीं हो सकती है? किन्तु मन में कदापि हिंसा का भाव नहीं होना चाहिए। चिकित्सक के मन में इस हिंसा का भाव न होने से उसके द्वारा की गई शल्य चिकित्सा को हिंसा नहीं कहा जाता।सत्यम् सत्य का कुछ भाव आर्जव शब्द की व्याख्या में प्रकट किया जा चुका है। प्रमाणों से सिद्ध अर्थ को उसी रूप में प्रकट करना सत्य कहलाता है।अक्रोध यहाँ इस शब्द का क्रोध का सर्वथा अभाव अर्थ अभिप्रेत नहीं है। साधना की स्थिति में कभीकभी किसी घटना अथवा किसी के दुर्व्यवहार से मन में क्रोध आ जाता है? परन्तु तत्काल ही उसे पहचान कर उसका उपशमन करने की क्षमता को यहाँ अक्रोध कहा गया है। साधक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह भी अपने क्रोध को क्रियारूप में व्यक्त न होने दे। इसी प्रकार की अन्य वृत्तियों का उपशमन करने की सार्मथ्य साधक को सम्पादित करनी चाहिए।त्याग यहाँ अहंकार और स्वार्थ का त्याग करने के लिए कहा गया है। पूर्व श्लोक के समान यहाँ उल्लिखित गुणों में भी परस्पर संबंध है। त्याग के अभाव में अक्रोध भी सिद्ध नहीं हो सकता? क्योंकि जब कोई हमारे अहंकार या स्वार्थ को चोट या हानि पहुंचाता है? तभी हमें क्रोध आता है।शान्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के मन में विक्षेपों का कोई कारण नहीं रह जाता? इसलिए उसके मन की शान्ति बनी रहती है। बाह्य जगत् की अथवा उसके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियां कितनी ही दुखदायक और आक्रामक क्यों न हों? उस व्यक्ति का मनसन्तुलन कभी विचलित नहीं होता है।अपैशुनम् किसी व्यक्ति के दोषों को अन्य लोगों के समक्ष प्रकट करने को पैशुन कहते हैं। पैशुन का अभाव ही अपैशुन है। वाणी की मधुरता या कर्कशता वक्ता के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। एक अयुक्त (अर्थात् अशुद्ध अन्तकरण वाले) पुरुष को अन्य लोगों की द्वेषयुक्त निन्दा करने में एक प्रकार का आसुरी आनन्द प्राप्त होता है। प्राय यह कोमल और मांसल जिह्वा ही किसी विनाशकारी अस्त्र से भी अधिक विध्वंसकारी सिद्ध होती है। आत्मविकास के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा रखने वाले उद्यमी साधक को ऐसा आन्तरिक सामञ्जस्य स्थापित करना चाहिए कि उसकी वाणी आत्मा की सुरभि का अनुकरण करे। स्वर की कोमलता? वचनों की स्पष्टता? निश्चय्ा की सत्यता? प्रच्छन्न अर्थ से रहित विचारों को श्रोता के मन में स्पष्ट करने की क्षमता? निष्कपटता? भक्ति और प्रेम इन सब से परिपूर्ण संभाषण वक्ता के व्यक्तित्व के आत्मचरित्र का एक विशिष्ट और श्रेष्ठ गुण ही बन जाता है। इस प्रकार के मधुर संभाषण के गुण का स्वयं में विकास करने से अपने व्यक्तित्व के अन्य आयामों का भी स्वत विकास हो जाता है? जो अन्तकरण को अनुशासित करने के लिए आवश्यक होता है।भूतमात्र के प्रति दया दुख और कष्ट से पीड़ित प्राणियों के प्रति कृपा का भाव दया कहलाता है। इसके अतिरिक्त? एक साधक को समाज में रहते हुए यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि समाज के सभी लोग उन्हीं आदर्शों या जीवन मूल्यों का अनुकरण करें? जिनके प्रति स्वयं उसकी श्रद्धा है। लोगों की दृष्टियों में भेद होता है और इसलिए उसे अपने आसपास के लोगों में अपूर्णता और दोष दिखाई दे सकते हैं। परन्तु? उनको इन समस्त दोषों के अन्तरंग में स्थित आत्मा के असीम सौन्दर्य को देखते रहना चाहिए। आत्मदर्शन की यह क्षमता ही सभी साधुओं और सन्तों के मन में स्थित प्राणिमात्र के प्रति दया का रहस्य है। सब के प्रति मन में प्रेम होने पर ही उनके प्रति असीम सहानुभूति और स्नेह का भाव हृदय में उठ सकता है। आत्मा की इस सुन्दरता को यदि अत्यन्त दुखी और दुश्चरित्र व्यक्ति में भी हम नहीं देख सके? तो उनके प्रति हमारे हृदय में स्नेह और दया उत्पन्न नहीं हो सकती।अलोलुपता प्रलोभित और आकर्षित करने वाले विषयों की उपस्थिति में भी मन में विकार उत्पन्न नहीं होना अलोलुपता है।मार्दव (मृदुता) और लज्जा यहाँ लज्जा का अर्थ है? निषिद्ध और निन्द्य प्रकार के कर्म करने में लज्जा का अनुभव करना। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि निन्द्य कर्मों का त्याग करना तथा शुभ कर्मों में गर्व का न होना अर्थात् नम्रता? विनयशीलता का होना लज्जा शब्द का अभिप्रेत अर्थ है। वस्तुत जो व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न होता है? उसमें स्वभाव की मृदुता और विनयशीलता स्वाभाविक रूप में आ जाती है? क्योंकि ये दोनों गुण मनुष्य की श्रेष्ठ संस्कृति के द्योतक हैं।अचापलम् मनुष्य के मन की चंचलता और स्वभाव की अस्थिरता उसकी शारीरिक चेष्टाओं में प्रकट होती है। सतत चंचलता? अकस्मात् कर्म का प्रारम्भ करना? अश्लील प्रकार की शारीरिक चेष्टाएं? व्यसनानन्द के अतिरेक से अंग प्रक्षेपण इत्यादि लक्षण केवल एक असंस्कृत व्यक्ति में देखे जाते हैं? जिसने न कभी स्वभाव की स्थिरता को और न कभी व्यक्तित्व को आदर्शपूर्ण बनाने का प्रयत्न किया हो। ये लक्षण एक शिशु में देखे जाते हैं? और उस दशा में वे उसके सौन्दर्यवर्धक ही माने जाते हैं। परन्तु जैसेजैसे व्यक्ति का विकास होता जाता है? उसका आत्मसंयम ही उसका सौन्दर्य समझा जाता है? जो उसकी शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा स्पष्ट होता है।श्री शंकराचार्य जी इसका अर्थ बताते हैं? प्रयोजन के अभाव में हाथ? पैर? वाणी आदि इन्द्रियों का व्यापार न होना अचापलम् कहलाता है। यह इस शब्द का व्यापक अर्थ है और इसका आशय यह भी है कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए उपयोगी कार्य में तत्परता और समस्त शारीरिक शक्तियों की मितव्ययिता होना चाहिए। अनावश्यक चेष्टाएं करना दुर्बल व्यक्तित्व का लक्षण है। ऐसे व्यक्ति कल्पनाओं में ही खोये रहते हैं और मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर अत्यन्त दुर्बल होते हैं। अत अचापलम् नामक गुण के सम्पादन से हम अपने व्यक्तित्व की अनेक प्रकार की सामान्य दुर्बलताओं का उपचार कर सकते हैं।और
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।।16.3।। तेज यह केवल मुखमण्डल की ही आभा नहीं है? जो पौष्टिक आहार और पर्याप्त विश्राम से प्राप्त होती है। तेज शब्द से ज्ञानी पुरुष के मात्र शारीरिक सौन्दर्य या तेज से ही अभिप्राय नहीं है। अध्यात्म की आभा कोई ऐसा प्रभामण्डल नहीं है? जो ज्ञानी के मुख के चारों ओर अग्निवृत के समान जगमगाता हो। तत्त्वदर्शी ऋषि का तेज है? उसकी बुद्धि की प्रतिभा? नेत्रों में जगमगाता आनन्द? सन्तप्त हृदयों को शीतलता प्रदान करने वाली शान्ति की सुरभि? कर्मों में उसका अविचलित सन्तुलन? प्राणिमात्र के प्रति उसके हृदय में स्थित प्रेम का आनन्द और उसके अन्तरतम से प्रकाशित आनन्द का प्रकाश। यह तेज ही उस ऋषि के व्यक्तित्व का प्रबल आकर्षण होता है? जो प्रचुर शक्ति और उत्साह के साथ सब की सेवा करता है और उसी में स्वयं को धन्य समझता है।क्षमा जिस सन्दर्भ में इस गुण का उल्लेख किया गया है? उससे इसका अर्थ गाम्भीर्य बढ़ जाता है। सामान्य दुख और कष्ट? अपमान और पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करनै की क्षमता ही क्षमा का सम्पूर्ण अर्थ नहीं है। बाह्य जगत् के अत्यधिक शक्तिशाली विरोध तथा उत्तेजित करने वाली परिस्थितयों के होने पर भी उनका सामना करने का सूक्ष्म कोटि का साहस और अविचलित शान्ति का नाम क्षमा है।धृति जब कोई व्यक्ति साहसपूर्वक जीना चाहता है? तब वह अपने जीवन में सदैव सुखद वातावरण? अनुकूल परिस्थितयाँ और अपने कार्य में सफलता के सहायक सुअवसरों को प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं कर सकता है। सामान्यत? एक दुर्बल व्यक्तित्व के पुरुष को अचानक निराशा आकर घेर लेती है और वह कार्य को अपूर्ण ही छोड़कर अपने कार्य क्षेत्र से निवृत्त हो जाता है। अनेक लोग तो ऐसे समय हतोत्साह होकर कार्य को त्याग देते हैं? जब विजयश्री उन्हें वरमाला पहनाने को तत्पर हो रही होती है निश्चल भाव से कार्यरत रहने के लिए मनुष्य को एक अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता होती है? जिसके द्वारा वह अपनी क्लान्त और श्रान्त आस्था काे पोषित कर दृढ़ बना सकता है। पुन एक युक्त पुरुष में निहित वह गुप्त शक्ति है धृति अर्थात् धैर्य। श्रद्धा की शक्ति? लक्ष्य में आस्था? उद्देश्य की एकरूपता? आदर्श का स्पष्ट दर्शन और त्याग की साहसिक भावना ये सब वे शक्ति श्रोत हैं? जहाँ से धृति की बूंदें रिसती हुई प्रवाहित होकर श्रम? अवसाद एवं निराशा आदि का परिहार करती हैं।शौचम् (शुद्धि) यह शब्द न केवल अन्तकरण के विचारों एवं उद्देश्यों की शुद्धि को इंगित करता है? वरन् इसके द्वारा वातावरण की शुद्धि? अपने वस्त्रों की और वस्तुओं की स्वच्छता भी सूचित की गयी है। आन्तरिक शुद्धि पर ही अत्यधिक बल देने के फलस्वरूप हम अपने समाज में बाह्य शुद्धि की सर्वथा उपेक्षा की जाते हुए देखते हैं। वस्त्रों की तथा नगर की स्वच्छता हमारे राष्ट्र में दुर्लभ हो गयी है। यद्यपि हमारे धर्म में साधक के लिए शुद्धि और स्वच्छता इन दोनों को ही अपरिहार्य बताया गया है? तथापि धर्णप्राण भक्तगण भी इनके प्रति उदासीन ही दिखाई देते हैं।अद्रोह अहिंसा का अर्थ है? किसी को भी पीड़ा न पहुँचाना और अद्रोह का अर्थ है मन में कभी हिंसा का भाव न उठना। जैसे? कोई भी व्यक्ति कभी स्वप्न में भी स्वयं को पीड़ित करने का विचार नहीं करता? वैसे ही आत्मैकत्व का बोध प्राप्त पुरुष के मन में किसी के प्रति भी द्रोह की भावना नहीं आती? क्योंकि अन्य को कष्ट देने का अर्थ स्वयं को ही पीड़ित करना है।न अतिमानिता इसका अर्थ है स्वयं की पूजनीयता के विषय में अतिशयोक्ति पूर्ण विचार न रखना। अतिमान के नहीं होने पर मनुष्य स्वयं को तत्काल ही सहस्रों अपरिहार्य उत्तेजनाओं से तथा अनावश्यक उत्तरदायित्वों से मुक्त कर सकता है। गर्वमुक्त पुरुष के लिए जीवन पक्षी के पंख के समान भारहीन होता है? जबकि एक अतिमानी पुरुष के लिए अपना जीवन प्राणदण्ड की शूली के समान बन जाता है? जिसे अत्यन्त कष्टपूर्वक वहन करते हुए उसे चलना पड़ता है? जब कि वह शूली उसके कंधों के मांस को निर्दयतापूर्वक छील रही होती है।उपर्युक्त छब्बीस गुण दैवीसम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति के स्वभाव का पूर्ण चित्रण करते हैं। पूर्णत्व प्राप्ति के सभी इच्छुक साधकों के मार्गदर्शन के रूप में इन गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है। जिस मात्रा में? उपर्युक्त दैवीगुणों के अनुरूप हम अपने जीवन को पुर्नव्यवस्थित करने में सक्षम होते हैं और जीवन की ओर देखने के अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं? उसी मात्रा में हम अपनी शक्तियों के निष्प्रयोजक व्यय को अवरुद्ध कर उन्हें सुरक्षित रख सकते हैं। इन जीवन मूल्यों का सम्मान करते हुए उन्हें जीने का अर्थ ही सम्यक् जीवन पद्धति को अपनाना है।अब? आसुरी सम्पदा का वर्णन करते हैं
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।।16.4।। केवल एक श्लोक की परिसीमा में ही जगत् के कुरूप व्यक्तित्व के पुरुषों की कुरूपता का इतना बोधगम्य वर्णन इसके पूर्व कभी नहीं किया गया था। आसुरी प्रवृत्तियों के प्रकार अनेक हैं? परन्तु यहाँ केवल कुछ मुख्य दुर्गुणों का उल्लेख किया गया है? जिनके द्वारा हम उन समस्त आसुरी शक्तियों को समझ सकते हैं? जो कभी भी मनुष्य के हृदय में व्यक्त होकर अपना विनाशकारी प्रभाव दिखा सकती हैं। इन सबको जानने का लाभ यह होगा कि हम अपने हृदय से अवांछित प्रवृत्तियों को दूर कर सकते हैं? और इस प्रकार हमें अपने विकास के लिए एक महत् शक्ति उपलब्ध हो सकती है।दम्भ श्री शंकाराचार्य के अनुसार दम्भ का अर्थ है वास्तव में अधार्मिक होते हुए भी स्वयं को धार्मिक व्यक्ति के रूप में प्रकट करना। दूसरे शब्दों में? स्वयं को वस्तुस्थिति से अन्यथा प्रकट करना दम्भ है। यह अत्यन्त निम्नस्तर का रूप है? जिसे पापी? दुराचारी लोग धारण करते हैं। उनकी यह सतही साधुता और शुद्धता? धार्मिकता और निष्कपटता वस्तुत अपने घातक उद्देश्यों और दुष्ट संकल्पों को आवृत करने के आकर्षक आवरण हैं।दर्प धन? जन? यौवन? ज्ञान? सामाजिक प्रतिष्ठा इत्यादि का अत्याधिक गर्व (दर्प) मनुष्य को एक असह्य प्रकार की उच्चता प्रदान करता है। तत्पश्चात् वह मनुष्य जगत् की घटनाओं की ओर आत्मवंचक विपरीत ज्ञान के माध्यम से देखता है और अपने ही काल्पनिक आत्मसम्मान के जगत् में रहता है। फलत? इस दर्प के कारण? वह आन्तरिक शान्ति से वंचित रह जाता है। ऐसा मनुष्य अपने ही समाज के लोगों के प्रेम से निष्कासित हो जाता है। दर्प युक्त पुरुष जगत् में एकाकी रह जाता है। केवल काल्पनिक आत्मसम्मान और अपनी महानता के स्वप्न ही उसके मित्र होते हैं। उसके वैभव को केवल वही स्वयं देख पाता है और अन्य कोई नहीं। ऐसा पुरुष स्वाभाविक ही अभिमानी बन जाता है।क्रोध दम्भ? दर्प और अभिमान से युक्त पुरुष जब यह पाता है कि लोगों की उसके विषय में जो धारणायें हैं? वे उसकी अपनी धारणाओं से सर्वथा भिन्न हैं? तब उसका मन विद्रोह कर उठता है? जो प्रत्येक वस्तु की ओर क्रोध के रूप में प्रकट होता है। क्रोधावेश से अभिभूत ऐसे पुरुष के कर्मों और वाणी में लोगों को व्यग्र कर देने वाली कठोरता (पारुष्य) और धृष्टता का होना अनिवार्य है।उपर्युक्त दम्भ? दर्प आदि का एकमात्र कारण है आत्म अज्ञान। वह न स्वयं को जानता है और न अपने आसपास की जगत् की संरचना को जानता है। परिणाम यह होता है कि वह यह नहीं समझ पाता कि उसको जगत् के साथ किस प्रकार का सुखद सम्बन्ध रखना चाहिए। सारांशत? वह नितान्त अहंकार केन्द्रित हो जाता है और वह चाहता है कि बाह्य जगत् उसकी अपेक्षाओं और इच्छाओं के अनुकूल और अनुरूप रहे। इतना ही नहीं? अपितु वह अपने कार्यक्षेत्र के कार्यकर्ताओं के लिए एक मूर्खतापूर्ण आचारसंहिता प्रस्तुत करता है और अपेक्षा करता है कि वे ठीक उसी के अनुसार व्यवहार करें। स्वयं के तथा जगत् के विषय में यह जो अज्ञान है? यही वह गुप्त कारण है जिसके वशीभूत पुरुष समाज के विरुद्ध विद्रोह कर विक्षिप्त के समान व्यवहार करता है।यह है आसुरी सम्पदा अर्थात् असुरों के गुण। इस श्लोक में चित्रित आसुरी सम्पदा की पृष्ठभूमि में? पूर्व वर्णित दैवी सम्पदा अधिक आकर्षक ढंग से उजागर होती है।अब? इन दोनों प्रकार की सम्पदाओं के कार्य अर्थात् फल बताते हैं।
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।।16.5।। दैवी और आसुरी गुणों की इतनी विस्तृत सूचियों को श्रवण कर कोई भी लगनशील साधक जानना चाहेगा कि वह किस सम्पदा से सम्पन्न है। प्राय साधकगण अपने अवगुणों के प्रति अधिक जागरूक होते हैं और इस कारण उन्हें स्वयं में दैवी गुणों की सम्पन्नता में पूर्ण विश्वास नहीं हो पाता। सम्भवत? इसी प्रकार की निराशा के भाव अर्जुन के मुख पर देखकर भगवान् श्रीकृष्ण उसे तत्काल सांत्वना देते हुए कहते हैं? हे पाण्डव तुम शोक मत करो? तुम दैवी गुणों के साथ जन्मे हो। यदि कोई विद्यार्थी रुचि और अध्यवसाय के साथ अध्ययन करते हुए गीता के इस अध्याय तक पहुँच जाता है? तो यही इस तथ्य का प्रमाण है कि वह दैवी सम्पदा से सम्पन्न है यहाँ सदाचार की सुन्दरता और दुराचार की कुरूपता का वर्णन करने का प्रय़ोजन सत्पुरुषों को नित्य स्वर्ग का और असत्पुरुषों को नित्य नारकीय यातनाओं का भोग करने हेतु भेजने का नहीं है यहाँ? विषय वस्तु के विवेचन का वैज्ञानिक आधार है। नैतिक गुणों का पालन करना मनुष्य की क्षीण शक्तियों और कलान्त प्रेरणाओं को पुनर्जीवित करने का बुद्धिमत्तापूर्ण साधन है। इन गुणों को अपने जीवन में जीने से? मनुष्य स्वनिर्मित संकल्पों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है दैवी सम्पदा मोक्ष का साधन है। इसके विपरीत? पापी पुरुषों के द्वारा अनुचरित दुष्प्रवृत्तियाँ मनुष्य को भ्रान्ति और दुख के साथ बांध कर रखती हैं और उसे अपने आन्त्ारिक व्यक्तित्व के विकास से वंचित रखती हैं आसुरी सम्पदा बन्धन का कारण है।तुम शोक मत करो कभीकभी साधकगण अत्यधिक भावुक बनकर निराश हो जाते हैं। तब उनकी प्रवृत्ति अपनी ही आलोचना करने की ओर हो जाती है। परिणामस्वरूप वे विषाद और अवसाद को प्राप्त होते हैं? जो कि एक प्रकार का मानसिक रोग है। ऐसा पुरुष कभी भी स्वयं में शक्तिवर्धक प्रसन्नता? आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प को नहीं पाता है जो कि आत्मनिरीक्षण और आत्मोपचार के लिए आवश्यक होते हैं। सदाचार का जीवन अपने आप में ही इस प्रकार के कुछ रोगों का उपचार कर देता है। हिन्दुओं की दृष्टि में? पापी पुरुष कोई मानसिक रूप से कुष्ठ रोगी नहीं है और न ही वह सर्वशक्तिमान् ईश्वर की विफलता का द्योतक है। वेदान्ती लोग असुर या राक्षस को ईश्वर के लिए नित्य चुनौती के रूप में नहीं देखते हैं।दुर्बलता और अज्ञान से युक्त शुभ ही अशुभ कहलाता है और इन दोषों से मुक्त अशुभ ही शुभ बन जाता है। धूलि से आच्छादित दर्पण अपने समक्ष स्थित वस्तु को प्रतिबिम्बित नहीं कर पाता परन्तु इसका कारण दर्पण की अक्षमता न होकर उस पर धूलि का आच्छादन है? जो वस्तुत उससे भिन्न है। दर्पण को स्वच्छ कर देने पर उसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब स्पष्ट प्रकाशित होता है। इसी प्रकार? एक दुराचारी पुरुष के हृदय में भी सच्चित्स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान होता है। परन्तु? दुर्भाग्य है कि वह प्रकाश उस पुरुष की अपनी ही मिथ्या धारणाओं एवं असत् मूल्यों के कारण आच्छादित रहता है।अब? असुरों का विशेष अध्ययन करने की दृष्टि से भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं
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।।16.6।। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ केवल दो प्रकार के दैवी और आसुरी लोगों का ही उल्लेख करते हैं? परन्तु वस्तुत सृष्टि में एक और प्रकार के लोग भी हैं जो सुधार के सर्वथा अयोग्य होते हैं। ये हैं राक्षसी प्रवृत्ति के लोग जिनके विषय में भगवान् सर्वथा मौन हैं। उनका यह मौन? संभवत उनकी वक्तृता से भी अधिक बोधक है धर्म और आत्मविकास की साधनाओं का उपदेश प्रथम दो प्रकार के लोगों के लिए है? राक्षसों के लिए नही? क्योंकि उनका अभी पर्याप्त विकास नहीं हुआ है वे अभी भी प्राणियों को गढ़ने वाली प्रकृति के हाथों में हैं और उन्हें अभी जीवन के सन्तप्त करने वाले अनुभवों की अग्नि में परिपक्व होने की आवश्यकता है। पर्याप्त विकास को प्राप्त होने पर ये राक्षसी लोग असुरों की श्रेणी में आ जाते हैं? जहाँ से आगे का पथप्रदर्शन उन्हें धर्म के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार? दैवी स्वभाव के उत्पन्न हो जाने पर उनके लिए आत्मविचार के द्वारा आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।इस अध्याय के चौथे श्लोक में आसुरी सम्पदा का संक्षिप्त रेखाचित्र ही चित्रित किया गया था जिसका सम्पूर्ण विस्तृत विवरण प्रस्तुत खण्ड में दिया गया है। विश्व के प्राय समस्त धर्मग्रन्थों में नैतिकता और सदाचार के सद्गुणों का तो स्तुतिगान गाया गया है परन्तु आसुरी पुरुष के अवगुणों का विस्तृत वर्णन उसमें क्वचित् ही मिलता है। हिन्दू धर्म के कुछ आलोचक जब हमारे धर्मशास्त्रों में ऐसे वर्णन को पाते हैं? तो टीका के योग्य विषय मिलने के कारण वे प्रसन्न हो जाते हैं। असुरों का वर्णन करना धर्मशास्त्रों एवं ऋषि मुनियों के लिए दूषणास्पद है? ऐसा उनका मत है। इस प्रकार की आलोचना विशेषत उन्नीसवीं शताब्दि के आलोचकों के द्वारा अधिक की जाती थी। परन्तु अब? बीसवीं शताब्दि में मनोविज्ञान के क्षेत्र में हुए अनुसन्धानों के परिणामों के कारण उन्हें मौन धारण करना पड़ा है। मनोविज्ञान्ा के अनुसार? अपने अवगुणों का तीव्रता से भान होना और अपनी हीन प्रवृत्तियों के प्रति घृणा उत्पन्न होना ही उनके निराकरण का सरल उपाय है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में इस आधार पर सफल प्रयोग भी किये गये हैं।अशुभ? शुभ का केवल विरोधी ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि शुभ प्रकृति के एक प्रकार के गुण हैं? तो अशुभ प्रकृति के उससे भिन्न लक्षण हैं। मनुष्य की प्रवृत्तियाँ विशिष्ट प्रकार की होती हैं? और शुभ और अशुभ दोनों ही उसके हृदय की अभिव्यक्तियाँ हैं। शुभ का त्रुटिपूर्ण अर्थ ही अशुभ है। इसलिए? आसुरी गुणों की इस सूची में हमें कोई पूर्वकथित दैवी गुणों के विरोधी लक्षणों की नीरस गणना नहीं मिलेगी। असुरों के स्वभाव का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि मूलत उनके गुण सत्पुरुषों के समान ही होते हैं? परन्तु उनका दुरुपयोग त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन के कारण अति उत्साह में आकर विपरीत दिशा में किया जाता है। अज्ञान से विषाक्त सद्गुण ही अवगुण बन जाता है? और अवगुण का उपचार करने पर वह विषमुक्त होकर सद्गुणरूपी स्वास्थ्य को पुन प्राप्त कर लेता है।इस प्रकार? आसुरी स्वभाव का वर्णन करने वाले इस खण्ड के प्रथम श्लोक में ही? मानो? उनके लिए क्षमा याचना करते हुए तथा उनके प्रति हमारे हृदय में छिपी करुणा को उजागर करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं
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।।16.7।। यहाँ प्रवृत्ति और निवृत्ति के शब्द क्रमश कर्तव्य कर्म और अकर्तव्य अर्थात् निषिद्ध कर्म हैं।धार्मिक अनुष्ठानकर्ता कर्तव्य पालन और निस्वार्थ समाज सेवा के द्वारा न केवल तात्कालिक लाभ को प्राप्त करता है अपितु अन्तकरण की शुद्धि भी प्राप्त करता है? क्योंकि वह कभी अपने सर्वोच्च लक्ष्य को विस्मृत नहीं होने देता। निषिद्ध कर्मों से विरति ही निवृत्ति कहलाती है। अकर्तव्य का त्याग ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। असुर लोगों को कर्तव्य और अकर्तव्य का सर्वथा अज्ञान होता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आसुरी गुणों की सूची अज्ञान से प्रारम्भ होती है। यदि कोई व्यक्ति अज्ञानवशात् किसी प्रकार का अपराध करता है? तो समाज के सहृदय पुरुषों के मन में उसके प्रति क्षमा का भाव सहज उदित होता है? भले ही न्यायालय में उसे क्षमा के योग्य कारण न माना जाये।बाह्य शुद्धि? बहुत कुछ मात्रा में मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व की परिचायक होती है। श्रेष्ठ शिक्षा और संस्कारी पुरुष में ही यह शुद्धि हमें देखने को मिलती है।अज्ञानी पुरुष में अन्तर्बाह्य शुद्धि का अभाव होता है। ऐसे अनुशासनविहीन पुरुष का व्यवहार (आचार) भी विनयपूर्ण नहीं हो सकता? क्योंकि बाह्य आचरण मनुष्य के स्वभाव की ही अभिव्यक्ति है। इसलिए भगवान् कहते हैं कि आसुरी लोगों में सदाचार का अभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।अविवेक? अशौच तथा अनाचार से युक्त पुरुष अपने वचनों की सत्यता का पालन कभी नहीं कर सकता। यदि हम इन उल्लिखित गुणों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करें? तो हमें स्पष्ट बोध होगा कि भगवान् के हृदय में इन दुराचारियों के प्रति कितनी करुणा है। सम्पूर्ण गीता में? इनके प्रति रञ्चमात्र भी प्रतिशोध या द्वेष का भाव प्रकट नहीं किया गया है। हम यह नहीं कह सकते कि आसुरी पुरुष जानबूझ कर असत्य का अनुकरण करता है। वास्तविकता यह है कि वह अपने स्वभाव से विवश निष्कपट व्यवहार करने में स्वयं को सर्वथा असमर्थ पाता है।
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।।16.8।। आसुरी लोगों के वर्णन में हम ऐसे नितान्त संशयी और भौतिकवादी पुरुष को पहचान सकते हैं? जो जीवन की ओर केवल अपनी सीमित बुद्धि के दृष्टिकोण से ही देखता है। इसलिए? स्वाभाविक ही है कि वह न जीवन का कोई चरम लक्ष्य देख पाता है? और न ही इस अनित्य और परस्पर असंबद्ध प्रतीत होने वाली घटनाओं से पूर्ण जगत् का कोई नित्य अधिष्ठान स्वीकार कर पाता है। इन भौतिकवादियों की बुद्धि प्रखर होती है और वे स्वतन्त्र और मौलिक विचार करने में समर्थ होते हैं। इन लोगों को अल्प मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है? जिससे कि वे अपनी सीमित बुद्धि के परे भी देख सकें। इस श्लोक में भौतिकवादी दृष्टिकोण का वर्णन किया गया है।भौतिकवादी वैज्ञानिक पद्धति से जगत् का निरीक्षण और विश्लेषण करते हैं? फिर भी वे उस सत्य को नहीं पहचान पाते? जो इस विश्व को धारण किये हुए है। वे परिवर्तनों को देखतें हैं? और इस सतत परिवर्तन को ही वे जगत् समझ लेते हैं? जिसके लिए किसी नित्य? अविकारी अधिष्ठान का होना वे नहीं मानते हैं। परन्तु? वैज्ञानिक भी अब स्वीकार करते हैं कि नित्य? अपरिवर्तनशील अधिष्ठान के बिना न जगत् में परिवर्तन हो सकता है और न ही वह ज्ञात हो सकता है। परिवर्तन तो एक सापेक्ष घटना मात्र है। एक स्थिर और गतिशून्य पर्दे के बिना चलचित्र का प्रक्षेपण नहीं किया जा सकता और नदी के स्थिर तल के बिना जल का अखण्ड प्रवाह नहीं बना रह सकता। उसी प्रकार अधिष्ठान के बिना आभास नहीं हो सकता। सम्पूर्ण जगत् का यह आश्रय ही सत्य कहलाता है परन्तु आसुरी स्वभाव के लोगों के अनुसार? जगत् निराश्रय है? सत्यरहित है।अनीश्वरम् जगत् का कोई अधिष्ठान नहीं है तब कमसेकम? क्या कोई सर्वज्ञ सर्वशासक है? जो जगत् की घटनाओं को नियन्त्रित करता है भोगवादी लोगों के अनुसार ऐसा कोई नियन्ता और निर्माता नहीं है। न सृष्टिकर्ता है और न पालनकर्ता ही है।इनके मतानुसार यह सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल महाभूतों के परम्पर संबंध से उत्पन्न हुआ है और यह संबंध जिस किसी रूप में परिणित होता है? वह केवल संयोग की बात है? और न कि उसके पार्श्व में कोई नियम है। प्राणियों की उत्पत्ति का एकमात्र कारण है? कामवासना। आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर बल देते हैं कि कामवासना ही अन्य समस्त वृत्तियों की जननी है? जिसके कारण समस्त घटनाएं घट रही हैं और जीवन की समस्त उपलब्धियाँ संभव,होती हैं।आसुरी लोगों के दृष्टिकोण को दर्शाने के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे लोगों के भाग्य के प्रति सहानुभूति अनुभव करते हुए उनके कर्मों को बताते हैं
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।।16.9।। पूर्व श्लोक में वर्णित दृष्टि का अवलम्बन करने वाले लोग किसी सत्य अधिष्ठान में श्रद्धा नहीं रखते हैं। यदि कामवासना को ही मूल कारण समझकर समाज में पाशविक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित किया जाये? तो उसका परिणाम सर्वत्र अशान्ति और कलह? विध्वंस और विनाश ही होगा।नष्टात्मान केवल वही पुरुष सन्तुलित व्यक्तित्व का हो सकता है? जिसने स्वयं को सम्यक् प्रकार से समझ लिया है। जब कभी मनुष्य को स्वयं का ही विस्मरण हो जाता है? तब वह अपने जन्म? शिक्षा? संस्कृति और सामाजिक प्रतिष्ठा के सर्वथा विपरीत एक विक्षिप्त अथवा मदोन्मत्त पुरुष के समान निन्दनीय व्यवहार करता है। पशुवत व्यवहार करता हुआ वह अपने विकास की दिव्य प्रतिष्ठा का अपमान करता है।अल्पबुद्धय जब कोई पुरुष जगत् के अधिष्ठान के रूप में श्रेष्ठ और दिव्य सत्य का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करता है? तब वह अत्यन्त आत्मकेन्द्रित और स्वार्थी पुरुष बन जाता है। तत्पश्चात् उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अधिकाधिक व्यक्तिगत लाभ अर्जित करना होता है। विषय वासनाओं की तृप्ति के द्वारा वह परम सन्तोष और आनन्द प्राप्त करने का सर्वसम्भव प्रयत्न करता है? परन्तु अन्त में निराशा और विफलता ही उसके हाथ लगती है। करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें अल्पबुद्धि कहकर उनके प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हैं।उग्रकर्मी यदि कोई व्यक्ति वास्तव में लोकतान्त्रिक और सहिष्णु विचारों का हो तो उसके मन में यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि यदि कोई नास्तिक भोगवादी पुरुष पारमार्थिक सत्य में विश्वास नहीं भी करता है? तो अन्य लोगों को उससे भिन्न सत्य श्रद्धा और विचार रखने की स्वतन्त्रता क्यों न हो ऐसे प्रश्न का पूर्वानुमान करके भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी स्वभाव के श्रद्धाहीन पुरुष में यही विवेक नहीं रह पाता है और वह सभी स्तरों पर निरंकुश व्यवहार करने लगता है। अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर कभीकभी ऐसे शक्तिशाली लोग अपने युग में घोर? विपत्तियों को उत्पन्न कर देते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से? आज का जगत् उसी संकटपूर्ण स्थति से गुजर रहा है जिसके विषय में गीता ने पूर्वानुमान के साथ बहुत पहले ही घोषणा कर दी थी जो भौतिकवादी आसुरी लोग सत्य में श्रद्धा नहीं रखते हैं? वे अनजाने ही समाज के सामंजस्य में ऐसी विषमता और विकृति उत्पन्न करते हैं कि जिसके कारण सम्पूर्ण विश्व विनाशकारी युद्ध के रक्तपूर्ण दलदल में फँस जाता है।आगे कहते हैं
Commentary
।।16.10।। जिस गर्व के साथ एक नितान्त भौतिकवादी व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के क्षेत्र में विचरण करता है? उसके आन्तरिक स्वभाव की भयंकर विद्रूपता को? व्यासजी के द्वारा किये गये इस वर्णन से अधिक अच्छी प्रकार से व्यक्त नहीं किया जा सकता। आसुरी पुरुष की मनस्थिति तथा समाज में उसके कर्मों का स्तर का और अधिक स्पष्ट एवं सम्पूर्ण वर्णन पाने के लिए हमें विश्व की सभी भाषाओं के विद्यमान साहित्य में खोजबीन करनी होगी? फिर भी इस सारगर्भित श्लोक के समतुल्य चित्रण पाने में हमें असफलता ही मिलेगी।काममाश्रित्य इच्छाओं की प्रेरणा के बिना कर्म कदापि नहीं हो सकते हैं। इच्छाओं के अभाव में जीवन की उपलब्धियाँ असंभव है। तथापि? कामनाओं का शिकार बने रहने का अर्थ है कर्मों का कोई भयंकर यन्त्र बनना? जो जगत् में अहंकार और अहंकार केन्द्रित मनोद्वेगों के विष का वमन करता रहता है। कामनाओं की तृप्ति के लिए ही जीवन धारण करना अविवेक का लक्षण है क्योंकि? कामना का यह विशेष कौशल हैकि जैसेजैसे हम उसे तृप्त करते जाते हैं वैसेवैसे ही? वह द्विगुणित होती जाती है। उन्हें तृप्त करना कठिन है? वे दुष्पूर हैं। ऐसी कामनाओं से युक्त पुरुष जब अपने विवेक और सार्मथ्य का उपयोग करता है? तब स्वाभाविक है कि व्ाह अपने मन में तथा बाह्य जगत् में विक्षेप और दुर्व्यवस्था को उत्पन्न करता है।कामना क्या है विषयोपभोग के द्वारा शाश्वत सुख और सन्तोष को प्राप्त करने का जीव का प्रयत्न ही कामना है। जब वह इस प्रकार मोहित हो जाता है? तब वह दम्भ? मद और मान का भी शिकार बन जाता है। उनके द्वारा प्रताड़ित वह अपनी निरंकुश इच्छाओं को तृप्त करने के लिए सतत संघर्ष और परिश्रम करता रहता है।मोहात् परिपूर्ण और तृप्त पुरुष के मन में कामना नहीं हो सकती। जो पुरुष अपने अनन्त स्वरूप को न जानकर स्वयं को परिच्छिन्न जीव ही समझता है? केवल उसे ही विषयों की कामना हो सकती है। इसे ही मोह कहते हैं।असुर लोगों के मन का चरित्र इस श्लोक की द्वितीय पंक्ति में पूर्ण होता है। उन्हें यहाँ अशुचिव्रता कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि ऐसे आसुरी स्वभाव के लोग येन केन प्रकारेण अपने ही सुख और शान्ति के लिए प्रयत्न करने में अन्य लोगों का कुछ भी महत्व नहीं समझते हैं। जीवन के सभी आदर्श मूल्यों को ताक में रखकर निर्लज्ज? असहिष्णु और क्रूर तक होकर वे अपने कार्यक्षेत्र में संघर्षरत रहते हैं। कामवासना से मदोन्मत्त और स्वार्थ से संवेदनाशून्य वह व्यक्ति जगत् में पागल के समान अपने चारों ओर रक्त और अम्ल फेंकता हुआ विपत्ति और विनाश का ही कार्य करता है एक व्यष्टि की दृष्टि से यह चित्र हमें एक ऐसे भोगवादी पुरुष को दर्शाता है? जो अपने जीवन का निर्माण कामना से विक्षुब्ध हुए मन की चंचल तरंगों पर करता है। समष्टि की दृष्टि से देखने पर यही शब्द चित्र हमें भौतिकवादी जनसमुदायों और राष्ट्रों की स्थिति का दर्शन कराता है। जीवन की सुन्दरता उस तत्त्वज्ञान की सुन्दरतापर निर्भर करती है? जिस पर जीवन का निर्माण होता है यदि नींव ही असत् हो? तो उसके ऊपर निर्मित ताश का महल अधिक सुदृढ़ नहीं हो सकता। यदि हम इस श्लोक को सूक्ष्मदृष्टि से देख सकें? तो ज्ञात होगा कि इसमें आज के जगत् में सर्वत्र अनुभव हो रहे आर्थिक विघटन? सामाजिक दोष? राजनीतिक उथलपुथल और अशान्ति का सम्पूर्ण विवेचन किया गया है।उपर्य़ुक्त वर्णन के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण अप्रत्यक्ष रूप से एक ऐसे भौतिकवादी पुरुष का चित्रण कर रहे हैं? जो अपने स्वभाव से ही नास्तिक विचारधारा का है तथा भोग के लिए ही कर्म करता है। क्या आज के भौतिकवादी युग में हम अपने को यथोक्त वर्णन के अनुरूप ही सिद्ध नहीं कर रहे हैं भगवान् आगे कहते हैं
Commentary
।।16.11।। चिन्ता और व्याकुलता से ग्रस्त ये हतोत्साहित लोग अपने निरर्थक उद्यमों के जीवन को दुख के गलियारे से खींचते हुए मृत्यु के आंगन में ले आते हैं। सामान्य जीवन में? ये चिन्ताएं शान्ति और आनन्द के दुर्ग पर टूट पड़ती हैं और विशेष रूप से तब? जब शक्तिशाली कामनाओं ने मनुष्य को जीतकर अपने वश में कर लिया होता है। अपनी इष्ट वस्तुओं को प्राप्त करने (योग) के लिए परिश्रम और संघर्ष तथा प्राप्त की गयी वस्तुओं के रक्षण (क्षेम) की व्याकुलता? यही मनुष्य जीवन की चिन्ताएं होती हैं। जीवन पर्यन्त की कालावधि केवल इन्हीं चिन्ताओं में अपव्यय करना और अन्त में? यही पाना कि हम उसमें कितने दयनीय रूप से विफल हुए हैं? वास्तव में एक बड़ी त्रासदी है।कामोपभोगपरमा सत्कार्य के क्षेत्र में हो या दुष्कृत्य के क्षेत्र में? मनुष्य को निरन्तर कार्यरत रहने के लिए किसी दर्शन (जीवन विषयक दृष्टिकोण) की आवश्यकता होती है? जिसके बिना उसके प्रयत्न असंबद्ध? हीनस्तर के और निरर्थक होते हैं।आसुरी स्वभाव के लोगों का जीवनदर्शन निरपवादरूप से सर्वत्र एक समान ही होता है। इस श्लोक में चार्वाक मत (नास्तिक दर्शन) को इंगित किया गया है। इस मत के अनुसार काम ही मनुष्य जीवन का परम पुरषार्थ है? अन्य धर्म या मोक्ष कुछ नहीं।इतना ही है सामान्यत? ये भौतिकतावादी मूर्ख नहीं होते? परन्तु वे अत्यन्त स्थूल बुद्धि और सतही दृष्टि से विचार करते हैं। वे यह अनुभव करते हैं कि केवल विषय भोग का जीवन दुखपूर्ण होता है? और इसमें क्षुद्र लाभ के लिये मनुष्य को अत्यधिक मूल्य चुकाना पड़ता है। फिर भी? वे अपनी अनियंत्रित कामवासना को ही तृप्त करने में रत और व्यस्त रहते हैं। उनसे यदि इस विषय में प्रश्न पूछा जाये? तो उनका उत्तर होगा कि यह संघर्ष ही जीवन है। वह सुख और शान्तिमय जीवन को जानते ही नहीं है। वे प्राय निराशावादी होते हैं और नैतिक दृष्टि से जीवन विषयक गंभीर विचार करने से कतराते हैं। फलत उनमें आत्महत्या और नर हत्या की प्रवृत्तियाँ भी देखी जा सकती हैं। उनकी धारणा यह होती है कि चिन्ता और दुख से ही जीवन की रचना हुई है। जीवन के सतही असामञ्जस्य और विषमताओं के पीछे जो सामञ्जस्य और लय है? उसे वह पहचान नहीं पाते। भविष्य में कोई आशा की किरण न देखकर उनका हृदय कटुता से भर जाता है और फिर उनका जीवन मात्र प्रतिशोधपूर्ण हो जाता है। निष्फल परिश्रम में वे अपनी शक्तियों का अपव्यय करते हैं और अन्त में थके? हारे और निराश होकर दयनीय मृत्यु को प्राप्त होते हैं।उपर्युक्त जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति को अगले श्लोक में बताते हुये भगवान् कहते हैं
Commentary
।।16.12।। आसुरी लोगों के स्वभाव को अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में उनके कार्य कलापों का वर्णन करते हैं। सैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुए पुरुष की मानसिक और बौद्धिक क्षमताओं का ह्रास होता रहता है। फिर वह अशान्त पुरुष प्रत्येक वस्तु? व्यक्ति और घटना के साथ अपने धैर्य को खोकर अपने विवेक और मानसिक सन्तुलन को भी खो देता है। उत्तेजना और सतत असन्तोष से ग्रस्त यह पुरुष काम और क्रोध के वशीभूत हो जाता है। कामना के अतृप्त या अवरुद्ध होने पर क्रोध उत्पन्न होना निश्चित है। कामना की पूर्ति के लिए वह संघर्ष करता है? परन्तु प्रतिस्पर्धा से पूर्ण इस जगत् में सदैव इष्ट प्राप्ति होना असंभव है और ऐसी परिस्थति में उसकी कामना उन्मत्त और उद्वेगपूर्ण क्रोध में परिवर्तित हो जाती है।ईहन्ते अथक परिश्रम के द्वारा वे अपनी नित्य वर्धमान कामना को सन्तुष्ट करने में प्रयत्नशील होते हैं। भोग के लिए विषयों का परिग्रह आवश्यक होता है। वे शान्ति और सुख को खोजने के स्थान पर उस एक संज्ञाविहीन तृष्णा को तृप्त करने का प्रयत्न करते रहते हैं? जो कि एक दीर्घकालीन असाध्य रोग के समान होती है। अपनी मनप्रवृत्तियों का निरीक्षण? अध्ययन एवं यथार्थ निर्णय पर पहुँचने के लिए आवश्यक मनसन्तुलन का उनमें सर्वथा अभाव होता है। इच्छापूर्ति की विक्षिप्त भागदौड़ में वे जीवन के दिव्यतत्त्व से पराङ्मुख हो जाते हैं और सत्यासत्य के विवेक की भी उपेक्षा करते हैं। कामना से प्रेरित होने पर वे अन्यायपूर्वक अर्थ का संचय करने में व्यस्त हो जाते हैं।यद्यपि आसुरी लोगों के इन लक्षणों को पाँच हजार वर्षों पूर्व लिखा गया था? परन्तु आश्चर्य है कि इस खण्ड को पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है? मानो यह आज के युग की कटु किन्तु सत्य आलोचना है इस प्रकार? यदि गीता के विद्यार्थी आज के गौरवशाली विज्ञान? भौतिक समृद्धि? लौकिक उपलब्धि और राजनीतिक मुक्ति के युग का परीक्षण करें? तो इस युग को आसुरी श्रेणी में ही मान्यता प्राप्त होगी। औद्योगिक संस्थानों के व्यापक प्रसार के चीखते हुए भोपुओं की कर्णकटु ध्वनि और आधुनिक वैज्ञानिक अस्त्रों के भयानक धमाके के मध्य तथा हमारे द्वारा आविष्कृत स्वविनाश की प्राकृतिक शक्तियों के कोलाहल में? हम भले ही सुदूर काल के ज्ञानी पुरुषों के द्वारा उद्घोषित सत्य की ओर ध्यान न दें? किन्तु गीता के निष्ठावान विद्यार्थी उन घोषणाओं की अकाट्य सत्यता को प्रत्यक्ष देखते हैं? और स्वभावत अपने युग के प्रति उनका मन उदास हो जाता है।उन पुरुषों के विचार इस प्रकार होते हैं
Commentary
।।16.13।। यह श्लोक स्वत स्पष्ट है। सामान्य लोग इसी प्रकार का जीवन जीते हैं। प्रतिस्पर्धा से पूर्ण इस जगत् में उस व्यक्ति को सफल समझा जाता है? जिसके पास अधिकतम धन हो। अत मनुष्य को जितना अधिक धन प्राप्त होता है? उससे उसकी सन्तुष्टि नहीं होती। धनार्जन की इस धारणा में हास्यास्पद विरोधाभास यह है कि धन प्राप्ति से सन्तोष होने के स्थान पर अधिकाधिक धन की इच्छा बढ़ती जाती है। आज तक किसी भी भौतिकवादी धनी व्यक्ति ने अपने धन को पर्याप्त नहीं माना है।इसके विपरीत स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण बताते हुए गीता में कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष की परिपूर्णता ऐसी होती है कि जगत् के विषय उसके मन में किंचित् भी विकार उत्पन्न नहीं करते हैं? और वही पुरुष वास्तविक शान्ति प्राप्त करता है? न कि कामी पुरुष।इस श्लोक में आसुरी पुरुष का भौतिक वस्तुओं के संबंध में दृष्टिकोण बताया गया है? अब अगले श्लोक में उसके व्यक्तिविषयक दृष्टिकोण को,बताते हैं।
Commentary
।।16.14।। इस श्लोक का अनुवाद ही इसकी व्याख्या भी है और बहुसंख्यक लोगों के जीवन की भी यही व्याख्या है सारांशत? यह अभिमानी जीव की सफलता का गीत है? जिसे एक नितान्त आसुरी पुरुष अपने मन में सदैव गुनगुनाता रहता है। इस आसुरी लोरी के मादक प्रभाव में? मनुष्य के श्रेष्ठ और दिव्य संस्कार उन्माद की निद्रा में लीन हो जाते हैं।एक भौतिकवादी पुरुष की स्वयं के विषय में क्या धारणा होती है सुनो
Commentary
।।16.15।। अज्ञान और उससे उत्पन्न विपरीत ज्ञान से मोहित तथा गर्व और मद से उन्मत्त आसुरी पुरुष जगत् की ओर इसी भ्रामक दृष्टि से देखता है। ऐसी स्थिति में स्वयं का तथा जगत् के साथ अपने संबंध का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करना स्वाभाविक ही है। उसे अपने धन? वैभव और कुल का इतना अभिमान होता है कि वह अपने समक्ष सभी को तुच्छ समझता है। स्वयं ही समाज से बहिष्कृत होकर वह मिथ्या अभिमान के महल में रहता है और असंख्य प्रकार की मानसिक यातनाओं का कष्ट भी भोगता रहता है। उसकी महत्त्वाकांक्षा यह होती है कि यज्ञादि के द्वारा वह देवताओं पर भी शासन करे और दान के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का क्रय कर ले। इस प्रकार? सम्मानित और पूजित होकर मैं मौज करूँगा। वे अज्ञान के गर्त में पड़े हुए आसुरी पुरुष के कुछ अत्यन्त विक्षिप्ततापूर्ण कथन हैं।उपर्युक्त तीन श्लोकों का सारांश बताते हुए कहते हैं
Commentary
।।16.16।। अनेकचित्त विभ्रान्ता आत्मकेन्द्रित और विषयासक्त पुरुष का मन सदैव अस्थिर रहता है। अनेक प्रकार की भ्रामक कल्पनाओं में वह अपनी मन की एकाग्रता की क्षमता को क्षीण कर लेता है।मोहजाल समावृता यदि ऐसे आसुरी पुरुष का मन सारहीन स्वप्नों में बिखरा होता है? तो उसकी बुद्धि की स्थिति भी दयनीय ही होती है। विवेक और निर्णय की उसकी क्षमता मोह और असत् मूल्यों में फँस जाती है। आश्रियविहीन बुद्धि किस प्रकार उचित निर्णय और जीवन का सही मूल्यांकन कर सकती है ऐसे दोषपूर्ण मन और बुद्धि के द्वारा जगत् का अवलोकन करने पर सर्वत्र विषमता और विकृति के ही दर्शन होंगे? समता और संस्कृति के नहीं।विषयों में आसक्त जिस पुरुष की बुद्धि मोह से आच्छादित हो और मन विक्षेपों से अशान्त हो? तो उसकी इन्द्रियाँ भी असंयमित ही होंगी। यदि कार की चालकशक्ति ही मदोन्मत्त हो? तो कार की गति भी संयमित नहीं हो सकती। इस लिए? ऐसे आसुरी स्वभाव के पुरुष विषयभोगों में अत्यधिक आसक्त हो,जाते हैं।वे अपवित्र नरक में गिरते हैं शरीर से थके? मन से भ्रमित और बुद्धि से विचलित ये लोग यहीं पर स्वनिर्मित नरक में रहते हैं तथा अपने दुख और कष्ट सभी को वितरित करते हैं। इस तथ्य को समझने के लिए हमें कोई महान् दार्शनिक होने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य में यह सार्मथ्य है कि वह समता के दर्शन से नरक को स्वर्ग में परिवर्तित कर सकता है और विषमता के दर्शन से स्वर्ग को नरक भी बना सकता है। अयुक्त व्यक्तित्व का पुरुष किसी भी स्थिति में शान्ति और पूर्णता का अनुभव नहीं करता। यदि समस्त वातावरण और परिस्थितियाँ अनुकूल भी हों? तो वह अपनी आन्तरिक पीड़ा और दुख के द्वारा उन्हें प्रतिकूल बना देता है।यदि इन आसुरी गुणों से युक्त केवल एक व्यक्ति भी सुखद परिस्थितियों को दुखद बना सकता है? तो हम उस जगत् की दशा की भलीभांति कल्पना कर सकते हैं जहाँ बहुसंख्यक लोगों की कमअधिक मात्रा में ये ही धारणायें होती हैं। स्वर्ग और नरक का होना हमारे अन्तकरण की समता और विषमता पर निर्भर करता है।आगे कहते हैं
Commentary
।।16.17।। यज्ञ शब्द से वेदोक्त कर्मकाण्ड ही समझने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु जैसा कि गीता के ही तीसरे अध्याय में कहा गया था निस्वार्थभाव से ईश्वर को अर्पण कर किये गये सभी सेवा कर्म यज्ञ ही कहलाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कर्म ही पूजा है।जब कभी कोई व्यक्ति समाज सेवा या राष्ट्र के कार्यक्षेत्र में प्रवेश करता है? तब यह आवश्यक नहीं कि वह सदैव शुद्ध यज्ञ भावना से ही कर्म करता हो। यद्यपि अनेक राजनीतिक नेता और समाज सेवक राष्ट्रोद्धार के लिए प्रयत्नशील दिखाई देते हैं? तथापि वस्तुस्थिति यह है कि राष्ट्र में शान्ति? समृद्धि और सम्पन्नता का अभाव ही है। इसका क्या कारण हो सकता है इसका कारण स्पष्ट है। जब आसुरी प्रकृति का व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में प्रवेश करता है? तब वह अपने सेवाभाव की घोषणा और प्रदर्शन भी करता है। परन्तु? वास्तव में? निस्वार्थ सेवा कर पाना उसके मूल स्वभाव के सर्वथा विपरीत होता है। समाज के ऐसे मित्र या सेवक नाममात्र के लिए सेवादरूप यज्ञ करते हैं। अनजाने ही? उनके कर्म अभिमान से विषाक्त? कामुकता से रंजित? गर्व से विकृत और इनके मिथ्या दर्शनशास्त्र से प्राय दूषित होते हैं। इस प्रकार उनके सभी कर्मों का एकमात्र परिणाम दुख ही होता है।ऐसे नीच लोग प्रतिदिन निम्नतर स्तर को प्राप्त होते जाते हैं
Commentary
।।16.18।। एक बार अहंकार के वशीभूत हो जाने पर मनुष्य का पशु से भी निम्नतम स्तर तक निरन्तर पतन होता जाता है। कामना से उन्मत्त वह पुरुष सुसंस्कृत मानव की प्रतिष्ठा से पदच्युत हो जाता है और तत्पश्चात् एक प्रभावहीन पशु के समान संदिग्ध रूप में समाज में विचरण करता है ऐसा व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से मनुष्य होते हुए भी मानसिक दृष्टि से पशु ही होता है। इस श्लोक में इन्हीं आसुरी लोगों का वर्णन किया गया है।यहाँ उल्लिखित अहंकारादि अवगुणों में से एक अवगुण भी भ्रष्टता के तल तक गिराने के लिए पर्याप्त है? परन्तु भगवान् कहते हैं कि आसुरी पुरुष इन सभी अवगुणों से युक्त होता है। इतना ही नहीं? अपितु वह इन्हें ही श्रेष्ठ गुण मानकर इनका अवलम्बन भी करता है। इनकी अभिव्यक्ति में ही वह सन्तोष का अनुभव करता है।प्राय नवयुवकों को यह उपदेश दिया जाता है कि उन्हें अपनी निम्नस्तर की हीन प्रवृत्तियों के प्रलोभनों का शिकार नहीं बनना चाहिए। कोई स्वच्छन्द प्रवृत्ति का युवक प्रश्न पूछ सकता है कि इसमें क्या हानि है गीताचार्य कहते हैं कि सभी सांस्कृतिक मूल्यों का अपमान करते हुए अहंकार स्वार्थ और कामुकता का जीवन जीने का परिणाम सम्पूर्ण नाश है।उपर्युक्त आसुरी गुणों से युक्त लोग जीवन की पवित्रता की उपेक्षा करेंगे और बिना किसी पश्चाताप् के उसे अपवित्र करने में भी संकोच नहीं करेंगे। ये परनिन्दा में प्रवृत्त होंगे और सबके शरीर में स्थित मुझ परमात्मा का द्वेष करेंगे। केवल शुद्धांन्तकरण में ही परमात्मा अपने शुद्ध स्वरूप से व्यक्त होता है? न कि विषय वासनाओं से आच्छादित अशुद्ध अन्तकरण में। सदाचार का पालन चित्त को शुद्ध करता है? परन्तु अनैतिकता और दुराचार? जीवन के सुमधुर संगीत को अपने विकृत स्वरों के द्वारा निरर्थक ध्वनि के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। दुराचारी पुरुष स्वयं अशान्त होकर अपने आसपास भी अशान्ति का वातावरण निर्मित करता है।अगले श्लोक में इन असुरों के पतन को बताते हैं
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।।16.19।। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कर्माध्यक्ष और कर्मफलदाता ईश्वर के रूप में यह वाक्य कह रहे हैं? मैं उन्हें आसुरी योनियों में गिराता हूँ। मनुष्य अपनी स्वेच्छा से शुभाशुभ कर्म करता है और उसे कर्म के नियमानुसार ईश्वर फल प्रदान करता है। अत इस फल प्राप्ति में ईश्वर पर पक्षपात का आरोप नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ? जब एक न्यायाधीश अपराधियों को कारावास या मृत्युदण्ड देता है? तो उसे पक्षपाती नहीं कहा जाता? क्योंकि वह तो केवल विधि के नियमों के अनुसार ही अपना निर्णय देता है। इसी प्रकार? आसुरी भाव के मनुष्य अपनी निम्नस्तरीय वासनाओं से प्रेरित होकर जब दुष्कर्म करते हैं? तब उन्हें उनके स्वभाव के अनुकूल ही बारम्बार अासुरी योनियों में जन्म मिलता है। यहाँ इंगित किये गये पुनर्जन्म के सिद्धांत का एकाधिक स्थलों पर विस्तृत विवेचन किया जा चुका है।और
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।।16.20।। इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य अपनी आसुरी प्रवृत्तियों के वश में उनका दास बना रहता है तब तक वह उसी प्रकार के हीन जन्मों को प्राप्त होता रहता है। वह आत्मा के परमानन्द स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता है।अब तक दैवी और आसुरी सम्पदाओं का स्पष्ट एवं विस्तृत विवेचन किया गया है। बहुसंख्यक लोगों की न्यूनाधिक मात्रा में असुरों की श्रेणी में ही गणना की जा सकती है। परन्तु एक आध्यात्मिक साधक को केवल ऐसे वर्णनों से सन्तोष नहीं होता। वह अपनी पतित अवस्था से स्वयं का उद्धार करना चाहता है। अत? अब भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मानवमात्र के आत्मविकास का पथ प्रदर्शन करते हैं। कोई भी व्यक्ति नित्य निरन्तर नारकीय यातनाओं का ही भागीदार नहीं हो सकता है शाश्वत नरक प्राप्ति का मत अयुक्तियुक्त और अदार्शनिक है।भगवान् कहते हैं
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।।16.21।। स्वर्ग सुखरूप है? तो नरक दुखरूप। अत इसी जीवन में भी मनुष्य अपनी मनस्थिति में स्वर्ग और नरक का अनुभव कर सकता है। शास्त्र प्रमाण से स्वर्ग और नरक के अस्तित्व का भी ज्ञान होता है। इस श्लोक में नरक के त्रिविध द्वार बताये गये हैं। इस सम्पूर्ण अध्याय का प्रय़ोजन मनुष्य का आसुरी अवस्था से उद्धार कर उसे निस्वार्थ सेवा तथा आत्मानन्द का अनुभव कराना है।काम? क्रोध और लोभ जहाँ काम है वहीं क्रोध का होना स्वाभाविक है। किसी विषय को सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करने से उस विषय की कामना उत्पन्न होती है। यदि इस कामनापूर्ति में कोई बाधा आती है? तो उससे क्रोध उत्पन्न होता है। यदि कामना तीव्र हो? तो क्रोध भी इतना उग्र रूप होता है कि वह जीवन की नौका को इतस्तत प्रक्षेपित कर? छिन्नभिन्न करके अन्त में उसे डुबो देता है।यदि कामना पूर्ण हो जाती है? तो मनुष्य का लोभ बढ़ता जाता है और इस प्रकार? उसकी शक्ति का ह्रास होता जाता है। असन्तुष्टि का वह भाव लोभ कहलाता है? जो हमारे वर्तमान सन्तुष्टि के भाव को विषाक्त करता है। लोभी पुरुष को कभी शान्ति और सुख प्राप्त नहीं होता? क्योंकि असन्तोष ही लोभ का स्वभाव है।काम? क्रोध और लोभ के इस क्रिया प्रतिक्रिया रूप संबंध को हम समझ लें? तो भगवान् का निष्कर्ष हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा कि इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।इन तीनों के त्याग की स्तुति करते हुए कहते हैं
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।।16.22।। जो साधकगण काम? क्रोध और लोभ से मुक्त होने का प्रयत्न करते हैं? वे वास्तव में अभिनन्दन के पात्र हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें आश्वासन देते हैं कि इन अवगुणों के त्याग से उन्हें परम लक्ष्य की प्राप्ति होगी। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए मानसिक और बौद्धिक शक्तियों की आवश्यकता होती है? जो प्राय इन कामादि अवगुणों के कारण व्यर्थ ही क्षीण होती है। इसलिए नरक के इन त्रिविध द्वारों को त्यागने का उपदेश यहाँ दिया गया है। यही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर है।श्रेयस् शब्द का अनुवाद नहीं किया जा सकता। संस्कृत के इस शब्द का आशय गंभीर और व्यापक है। श्रेयमार्ग के आचरण से न केवल साधक का ही कल्याण होता है? अपितु अपने आसपास के समाज के कल्याण में भी वह सहायक होता है।इस प्रकार सही दिशा में उन्नति करता हुआ साधक परम लक्ष्य को प्राप्त होता है। सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास कोई एक दिन में घटने वाली आकस्मिक घटना नहीं है। जिस प्रकार? एक फूल की कली शनै शनै खिलती जाती है? उसी प्रकार? अनुशासन? अध्ययन एवं सन्मार्ग के आचरण से पूर्णत्व की प्राप्ति तक का विकास शनै शनै होता है। फूल के विकास की अपेक्षा आत्मविकास कहीं अधिक नाजुक है।इस श्लोक में अवगुणों का त्याग से परा गति की प्राप्ति कही गयी है। परन्तु यहाँ पूछा जा सकता है कि त्याग के द्वारा योग (प्राप्ति) कैसे हो सकता है कुभोजन के त्याग मात्र से पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति कैसे संभव है भगवान् कहते हैं कि जो पुरुष इन अवगुणों का त्याग करता है? वह फिर? स्वाभाविक ही अपने आत्मकल्याण के मार्ग का भी अनुसरण करता है? जिसके फलस्वरूप उसे पूर्णत्व की प्राप्ति होती है।आसुरी सम्पदा के त्याग तथा श्रेय साधन के आचरण का उपाय धर्मशास्त्र में ही बताया गया है। इसलिए? शास्त्रों का अध्ययन करके तदनुसार आचरण ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर है? परन्तु
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।।16.23।। गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश यह है कि कामक्रोधादि आत्मघातक अवगुणों के त्याग से आन्तरिक शक्तियों का जो संचय किया जाता है? उसका आत्मोन्नति के लिए सदुपयोग करना चाहिए। ऐसा न करने पर मनुष्य का जो पतन होता है? उससे पुन ऊपर उठना अति कठिन हो जाता है। रावणादि के समान असुरों का चरित्र इस तथ्य का विशिष्ट प्रमाण है। ये असुर तपश्चर्या के द्वारा असीम शक्तियां प्राप्त करते थे? परन्तु उसके दुरुपयोग करके वे आत्मनाश ही करते थे उनकी शक्तियां ऐसी अद्भुत और भयंकर थीं कि उन्होंने अपनी पीढ़ी को हिला दिया था और उसे चूरचूर कर पृथ्वी की धूल चटा दी थी। स्वयं को तथा इस जगत् को अनर्थ से सुरक्षित रख्ाने के लिए लोगों को गम्भीर चेतावनी की आवश्यकता है। इन अन्तिम दो श्लोकों में यही चेतावनी दी गयी है।जो पुरुष शास्त्रविधि की उपेक्षा करके अपनी स्वच्छन्द प्रकृति के अनुसार ही काम करता है? उसे वस्तुत किसी प्रकार का भी लाभ नहीं होता। यहाँ शास्त्र शब्द से कठिन और विस्तृत कर्मकाण्ड को ही समझना आवश्यक नहीं है? जिसका अनुष्ठान और उपदेश रूढ़िवादी लोग विशेष बल देकर करते हैं। ब्रह्यविद्या का तथा तत्प्राप्ति के साधनों का उपदेश जिन ग्रन्थों में दिया गया है उन्हें यहाँ शास्त्र कहा गया है। ऐसे ग्रन्थ मुख्यत उपनिषद् हैं। वेदान्त के प्रतिपाद्य विषय तथा परिभाषिक शब्दावली का वर्णन करने वाले ग्रन्थों को प्रकरण ग्रन्थ कहा जाता हैं। गीता में ब्रह्मविद्या तथा तत्प्राप्ति के साधन उपदिष्ट है? इसलिए गीता भी शास्त्र ही है।कामकारत प्रस्तुत खण्ड में काम? क्रोध और लोभ के त्याग का उपदेश दिया गया है। हमने यह देखा कि क्रोध और लोभ का मूल कारण काम ही है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ केवल काम का ही उल्लेख करते हुए कहते हैं कि काम से प्रेरित मनुष्य को परम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती।वह न सिद्धि प्राप्त करता है न सुख और न परा गति। गीता के उपदेश का पालन न करने से क्या हानि होगी इसका उत्तर यह है कि कामना से प्रेरित? लोभ से प्रोत्साहित और क्रोध से विक्षिप्त पुरुष सदैव अशान्ति और क्रूर मनाद्वेगों से पूर्ण जीवन को ही प्राप्त करता है। ऐसा पुरुष न सुख प्राप्त करता है और न आत्मविकास।अत? निष्कर्ष यह निकलता है कि
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।।16.24।। पूर्व के तीन श्लोकों में दी गई युक्तियों का यह निष्कर्ष निकलता है कि साधक को शास्त्र प्रमाण के अनुसार अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्राध्ययन के द्वारा ही हो सकता है। सत्य की प्राप्ति के मार्ग को निश्चित करने में प्रत्येक साधक अपनी ही कल्पनाओं का आश्रय नहीं ले सकता । शास्त्रों की घोषणा उन ऋषियों ने की है? जिन्होंने इस मार्ग के द्वारा पूर्णत्व का साक्षात्कार किया था। अत जब उन ऋषियों ने हमें उस मार्ग का मानचित्र दिया है? तो हमारे लिए यही उचित है कि विनयभाव से उसका अनुसरण कर स्वयं को कृतार्थ करें।ज्ञात्वा इसलिए आत्मदेव की तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व हमें इन शास्त्रों का बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। लक्ष्य? मार्ग? विघ्न और विघ्न के निराकरण के उपायों का जानना किसी भी यात्रा के लिए अत्यावश्यक और लाभदायक होता है।तुम्हें कर्म करना चाहिए अनेक लोग शास्त्र को जानते हैं?परन्तु ऐसे अत्यन्त विरले लोग ही होते हैं? जिनमें शास्त्रोपदिष्ट जीवन जीने का साहस? दृढ़ संकल्प और आत्मानुभूति के लक्ष्य की प्राप्ति होने तक धैर्य बना रहता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि काम? क्रोध और लोभ का त्याग कर मनुष्य को शास्त्रानुसार जीवन यापन करना चाहिए। यही कर्मयोग का जीवन है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोढशोऽध्याय।।

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।।16.1।। इस प्रथम श्लोक को पढ़ने से हमें उन अमानित्वादि बीस गुणों (जीवनादर्शों) का स्मरण होता है? जिन्हें क्षेत्राध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान की संज्ञा प्रदान की थी। इस श्लोक में उन आदर्श गुणों की प्राय सम्पूर्ण सूची प्रस्तुत की गयी है? जो आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एक सुसंस्कृत पुरुष में देखे जाते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में उन बीस गुणों को जीना ही आध्यात्मिक जीवन कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्ण इन दैवी गुणों की गणना करते समय प्रथम स्थान अभय को देते हैं। भय अविद्या का लक्षण है। जहाँ विद्या है? वहाँ निर्भयता है। गुणों की इस सूची में अभय को प्रथम स्थान देकर गीताचार्य़ यह इंगित करते हैं कि किसी साधक की नैतिक पूर्णता उसके आध्यात्मिक विकास के समान अनुपात में होती है।अन्तकरण की शुद्धि अपने व्यक्तित्व के बाह्य स्तर पर साधक को कितना ही संयम क्यों न हो? फिर भी वह संयम उसे रचनात्मक और निश्चयात्मक शक्ति प्रदान नहीं कर सकता? जो कि नैतिक जीवन का सार है? मर्म है। गीता? सैद्धांतिक और व्यावहारिक इन दोनों ही दृष्टियों से एक शक्तिशाली धर्म का उपदेश देती है। निष्क्रिय सदाचार का पालन करने वाली आज्ञाकारी पीढ़ी से भगवान् श्रीकृष्ण सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि समाज के सभी लोग न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में ही सर्वोच्च नैतिक मूल्यों को जियें? वरन् सामाजिक जीवन में भी धर्माचरण की ऐसी नवचेतना जाग्रत करें? जिससे मनुष्यों की सम्पूर्ण पीढ़ी ही सत्य और धर्म के प्रकाश से उज्वल बन जाये। धर्म शब्द के अर्थ में उद्देश्यों की सत्यता और साधनों की शुद्धता अन्तर्निहित है।ज्ञानयोगव्यवस्थिति अत्यन्त देहासक्त और विषयासक्त पुरुष को उपर्युक्त अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। आत्मा के दिव्य गान के साथ एकस्वर हुए मन में ही अपनी निम्न स्तर की वृत्तियों? बन्धनकारक आसक्तियों और निन्द्य उद्देश्यों को त्यागने की आवश्यक सार्मथ्य होती है। ये हीन वृत्तियां सदैव अन्तकरण में उभर कर सामने आती रहती हैं। ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति ही मन को निम्नस्तर के प्रलोभनों से निवृत्त करने का निश्चयात्मक उपाय है। यदि कोई बालक कांच की निर्मित नाजुक कलाकृति के साथ खेल रहा हो? तो उसके मातापिता? उस बहुमूल्य वस्तु की सुरक्षा के लिए? प्राय बालक को चॉकलेट आदि कोई वस्तु देते हैं और वह बालक उसे पान्ो के लिए उस कांच की मूल्यवान् वस्तु को त्याग देता है। इसी प्रकार? आत्मा के आनन्द को अनुभव करने वाले पुरुष इन्द्रियों के विषयों तथा तज्जनित क्षणिक सुखों में स्वभावत आसक्त नहीं होता।दान? दम (इन्द्रिय संयम) और यज्ञ ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त करने के ये तीन साधन हैं जिनके द्वारा एक साधक अन्तकरण की योग्यता प्राप्त कर सकता है। बहुलता के भाव से उत्पन्न हुई दान की प्रवृत्ति ही वास्तविक दान है। जब हम अन्यों के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं? तभी हम सबके साथ अपने सर्वस्व का विभाजन करने के लिए तत्पर होते हैं? अन्यथा नहीं। इस प्रकार? दान का उदय हमारी इस क्षमता से होता है? जिसके द्वारा हम अपनी परिग्रह और लोभ की प्रवृत्ति को संयमित करते हैं। जहाँ इनका संयमन एक पक्ष है? तो दूसरा पक्ष है यज्ञ अर्थात् त्याग की भावना। यज्ञ भावना से प्रेरित होने पर ही हम अपने संग्रह का दान कर सकते हैं। दान शब्द से केवल धन या वस्तुओं का ही दान नहीं? वरन् दुखियों के साथ सहानुभूति का भाव तथा ज्ञानदान भी इसमें सम्मिलित है।यदि दान साधक के वैराग्य को विकसित करता है? जिससे वह साधक अपनी सम्पत्ति का विनियोग दीनजनों की सहायता में करता है? तो हम कह सकते हैं कि हमारे व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रियसंयम (दम)? उसी यज्ञ भावना का संप्रयोग है। इन्द्रियों के विषयों में विचरण करने का पूर्ण अधिकार देने का अर्थ अपनी सम्पूर्ण शक्ति का निष्फल ही अपव्यय करना है। साधक को चाहिए कि अपनी इस शक्ति का उपयोग वह अपने ध्यानाभ्यास में करे। मन को आत्मा में समाहित करने के लिए सूक्ष्म शक्ति की आवश्यकता होती है और उसे साधक इन्द्रियसंयम के द्वारा अपने में ही निहित देख सकता है। दान और दम के बिना सत्य की तीर्थयात्रा मात्र स्वप्न ही है।यज्ञ वैदिककाल में यज्ञ शब्द का अर्थ श्रद्धायुक्त होमहवन आदि का अनुष्ठान समझा जाता था। उस काल में साधकगण इन यज्ञों का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करते थे। पौराणिक काल में वैदिक कर्मकाण्ड का स्थान मूर्तिपूजा? प्रार्थना जैसी भक्ति साधनाओं ने ले लिया जो उसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। यज्ञ अर्थात् पूजा के अनुष्ठान से मन को एक आलम्बन प्राप्त होने से इन्द्रियों का संयमन करने में सरलता होती है। उसी प्रकार? चित्त की शुद्धता भी प्राप्त होने से दान की भावना भी जागृत होती है। इन गुणों के होने से आत्मानुभूति सहज सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार? इस श्लोक में यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रत्येक उत्तरोत्तर गुण अपने पूर्व के गुण से किस्ा प्रकार संबद्ध है।स्वाध्याय इस शब्द का पारम्परिक अर्थ है? वेदों का नित्य पठन तथा यथासंभव उसका अध्ययन भी करना। वेदों के नित्य? नियमित अध्ययन से हमें अपने व्यावहारिक जीवन में दैवी गुणों को जीने की प्रेरणा मिलती है। परन्तु? स्वाध्याय से मात्र वेदपठन या बौद्धिक स्तर पर उसके अर्थ को समझना ही पर्याप्त नहीं है। संस्कृत के इस शब्द का आशय है स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मनिरीक्षण। वेदप्रतिपादित सत्यों को समझकर उनका स्वानुभवकरण ही वास्तविक स्वाध्याय है। स्वाध्याय और यज्ञ से हमें आत्मसंयम का जीवन जीने का साहस प्राप्त होगा? जो हमें अपने ध्यानाभ्यास में चित्त की स्थिरता प्रदान करेगा।तप शारीरिक स्तर पर पालन किये जाने वाले व्रत? उपवास आदि तप कहलाते हैं। तपाचरण से बाह्यजगत् के भोगों में व्यर्थ ही नष्ट होने वाली हमारी शक्ति का संचय होता है? जिसके सदुपयोग आत्मविकास के लिए किया जा सकता है।आर्जवम् इसका अर्थ है सरलता। बुद्धि के विचार? मन की भावनाओं और कर्मों में कुटिलता का साधक के व्यक्तित्व पर आत्मघातक परिणाम होता है। हमारे वास्तविक उद्देश्यों और प्रेरणाओं? निश्चय और आकांक्षाओं? विवेक और अनुभवों को असत्य सिद्ध करने वाले हमारे कर्मों का परिणाम अपने व्यक्तित्व की वक्रता होता है। जो व्यक्ति इस प्रकार का व्यक्तित्व जीता है? उसका जीवन दो भागों में विभाजित हो जाता है और शीघ्र ही वह अपनी कार्यकुशलता की आभा को खो देता है और व्यक्तिगत दृढ़ता की शक्ति की दृष्टि से भी दुर्बल हो जाता है।इस प्रकार? इस अध्याय के प्रथम श्लोक में ही? दैवीगुणों का उल्लेख करते हुए? उनके परस्पर संबंधों को भी दर्शाया गया है। हिन्दू धर्ण में वर्णित नैतिक मूल्य और सदाचार के नियम किसी कल्पनाकुशल सन्त या उदास देवदूत की स्वैच्छिक घोषणाएं नहीं हैं। विवेक और अनुभवों की दृढ़ चट्टानों की नींव पर उनका निर्णाण हुआ है। निष्ठापूर्वक उनका पालन करने और सजगतापूर्वक उन्हें जीने पर? वे हमारी प्राय सुप्त दैवी क्षमताओं को व्यक्त करने में अपना योगदान देते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार ये दैवी गुण अपने आप में स्वर्ग प्रवेश का अधिकार प्रदान नहीं कर सकते? परन्तु मनुष्य के हृदय में स्थित दिव्य आत्मतत्त्व को पूर्णतया उजागर करने म्ों वे पूर्ण तैयारी के रूप में सहायक होते हैं।और आगे कहते हैं